भग्न तन, रुग्ण मन
–सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
भग्न तन, रुग्ण मन,
जीवन विषण्ण वन ।
क्षीण क्षण-क्षण देह,
जीर्ण सज्जित गेह,
घिर गए हैं मेह,
प्रलय के प्रवर्षण ।
चलता नहीं हाथ,
कोई नहीं साथ,
उन्नत, विनत माथ,
दो शरण, दोषरण ।
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